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पहरे बिठा दिये !_मोहम्मदअलीवफा
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पहरे बिठा दिये !_मोहम्मदअलीवफा - 18th March 2007, 01:35 PM

पहरे बिठा दिये !


ईजाजत नहीं ईजहार की वरना में चींखता
लब पर हमारे तुमने क्योँ पहरे बिठा दिये !

पाक दामन को करो ए मुक़तदाए क़ौम
चश्मे मासुम पर ए क्यों पर्दे गिरा दिये!


_मोहम्मदअलीवफा


پہرے بیتھا دےِ ۔ مُحَممّدعلی،وَفا،

اِجازت نہیں اِذہارکی ورنہ میں چیںکھتا
لب پہ ہمارے تم نے کیوں پہرے بیتھا دِے۔

پاک دامن کو کرو اے مُقتداءے قَئوم
چشمِ مَئعصوم پر کیوں پرڈے گِرا دِے۔

مُحَممّدعلی،وَفا،
   
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गुमनाम न मिला_मुहम्मदअलीवफा
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गुमनाम न मिला_मुहम्मदअलीवफा - 24th March 2007, 08:53 AM

गुमनाम न मिला_मुहम्मदअलीवफा


तेरे कुचेमें कोइ भी बदनाम न मीला
थे अजनबी तो बहुत गुमनाम न मिला.

ईंटथी पथ्थरथे यादोंके मलबोंके तले
तारीख के खंडहरमे सामान न मीला.

बीखरी हुई झूल्फें संवारी है शौक़से
बदनामहो गऎ मगर नाम न मीला .

और भी रंझीशे थी रोने के लिये खुब
क्या करे ईशक़ में कोइ काम नमीला.

दिल बेठ गया तौहीने मयकदे से अब
एसका नहीं शिकवा कि जाम न मीला.

सो लेते हम भी वफा कुछ सकुनसे
ये दिलकी तरपको कभी आराम न मीला


_मुहम्मदअलीवफा(24मार्च2007)
   
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एंतेजार छोड_मोहंमदअली वफा
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एंतेजार छोड_मोहंमदअली वफा - 28th March 2007, 08:19 AM

एंतेजार छोड


साकी बहारका तु अब ईंतेजार छोड
भरता जा बहकी हुई नजरोके पैमाने

आती जाती मौसम एतो हे भला
ईसमे कभी पगले उलझ्ते है दीवाने?



_मोहंमदअली वफा
   
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कैसे कटे सफर.
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कैसे कटे सफर. - 6th April 2007, 05:19 PM

कैसे कटे सफर.


बुझे हुएं हैं दिल और झुकी हुई नजर..
बस खुदाके वास्ते अब रोक लो हुनर.

किस रास्तेंसे गुजरें कुछ्तो बताओ यार
युं लुंटते फीरे तो फिर कैसे कटे सफर.



_मोहंमदअलीवफा
   
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रोज रोज
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रोज रोज - 12th April 2007, 08:56 AM

रोज रोज

क़ातिल भी कई रूप में आतें है रोज रोज.
बेहया और ये बेशर्म गातें है रोज रोज.

बदलते ही रहे रूप रोज ये गीध और कुत्ते
लहमे ईनसान को भीये खातें है रोज रोज.

आलात मील जाये गर खुद नुमाइ का कोइ
छोडते नहीं ये उसे और बजाते है रोज रोज.

इनसांके खूनका भी गर मिल जाये चढावा,
जा कर पूजा घरोंमेँ ये चढातें है रोज रोज.

गर कभी मौका मीला बन जाये मुगन्नी
ये भैडये ईनसांका खोल चढातें है रोज रोज.

साजिन्दोकी की यहां अब क्या कमी वफा
लाश बेसुरों बेताल की उठातें है रोज रोज.



_मोहंमदअली वफा(11अप्रील2007)

नक्काल




मतलबकी थाली के बैगन मुगन्नीके नांको के बाल.
शायरो में शायर बन जाते कव्वालोंमें कव्वाल.


मुफ्तकी खीच्डी पकानेको काजिब सियासी कलब
कया कया अजीब रंग दिखाते ये बहुरूपये नक्काल

_मोहंमदअली वफा(11अप्रील2007)

लाल रंगवाला पहेला शेर राजा महेदी अली खां(मर्हुम) का है.
   
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निभाना भी जानता हुं_मोहंमद अलीवफा
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निभाना भी जानता हुं_मोहंमद अलीवफा - 20th April 2007, 07:06 AM

फूलकी पत्तीसे कट सकता है हीरे का जिगर
मर्दे नादांके लिये कलामो नर्मो नाझुक बे असर.


(भर्तु हरी, अल्लामां डॉ.मोहमद ईकबाल की
जबांसे)



निभाना भी जानता हुं_मोहंमद अलीवफा

साथ मगरका निभाना भी जानताहुं
पानी मेंआग लगाना भी जानता हुं

दरदे दिल में परखना भी, जानता हुं
मिर्च जखम पे छिडकना भी जानता हुं.

पाया एसा जर्फ कि बरदाश्त करुं सब
पत्तीसे गुल की कतरना भी जानता हुं.

फरेबे नजर सुंघ लेता हुं कभी कभी
हसते लबको रुलाना भी जानता हुं.

खंजर को देख कर भी आस्तीनो में
देकर ये जां हसाना भी जानता हुं.

दीवारये नहीं तूटती फूल मलनेसे
पथ्थर को में गिराना भी जानता हुं.

रक्खे तुझे न धोके मे लबे खमोशी
लफ्जी शीशा बहाना भी जानता हुं.

जल घोंसले हमारे जाये बहार मे
सब्रसे उस्को निभाना भी जानता हुं.

खूने ईंसा नहीं जाता येअब देखा
आग मे में नहाना भी जानता हुं.

खोलो हमारे लिये गमके मय खाने
जामे खुशी पिलाना भी जानता हुं.

लावा टपकेवफा आंखो के विरां मे
मुरव्वतसे बुझाना भी जानता हुं.

_
_मोहंमद अलीवफा(15एप्रील007)
   
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ईशक़ का યે कारवां _मोहमंदअली;वफा
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ईशक़ का યે कारवां _मोहमंदअली;वफा - 30th April 2007, 10:56 AM

ईशक़ का યે कारवां _मोहमंदअली;वफा


बनते बनते बनता है ईशक़ का યે कारवां
चंद ठोकरसे कभी उड जाता है उसका धुआं.

कैस को जंगलकी सूझी लयला महेमिलमें रही
और देखते रह गये बयाबांमे गझाले थे समां


_मोहमंदअली;वफा
   
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शैतान झिंदाबाद कि ईनसान झिंदाबाद
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शैतान झिंदाबाद कि ईनसान झिंदाबाद - 5th May 2007, 03:46 AM

शैतान झिंदाबाद कि ईनसान झिंदाबाद


मझलुम मुर्दा बाद और जालिम झिंदाबाद
मकतुल मुर्दा बाद और कातिल झिंदाबाद

खुंखार दरीन्दो के हामी बने सब लोग
सचका सुरज ढल चुका बातिल झिंदाबाद

डाका जिसके घर पडा उसको पकड लिया
मासुम मुर्दा बाद और मुजरिम झिंदाबाद

बात गांधीजीकी तो दोहराता है हर शख्श
मौका मिला तो कातिलका आलम झिंदाबाद


एक सवाल कांटा बन कर चुभ गयावफा
शैतान झिंदाबाद कि ईनसान झिंदाबाद ?


__मोहंमदअलीवफा
   
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जलने दे मेरे दोस्त__मोहंमदअलीवफा
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जलने दे मेरे दोस्त__मोहंमदअलीवफा - 8th May 2007, 09:12 AM

जलने दे मेरे दोस्त_मोहंमदअलीवफा

चलताहुं में जीस तरह चलने दे मेरे दोस्त
जलताहुं में जीस तरह जलने दे मेरे दोस्त.

वल्लाह पुछ्ना नही मंझिलका भी पता
मेरे कदमको युंही मचलने दे मेरे दोस्त.

तुलुअ तो होता हुं मगर मेरी अदासे
तारिक्यां छानेको है ढलने दे मेरे दोस्त.

खुश्क न हो जाये ये तेरे ईश्क की तरह
ये आंखके दरियेको बहने दे मेरे दोस्त.

ईसरार से रुकता नहीं खुशियोंका काफला
गमके बादलोंको भी गिरने दे मेरे दोस्त.

शिकवा नहीं ईस लिये बदगुमां है तु
चुपकेसे ये आहें जरा भरने दे मेरे दोस्त.

जीनेकी बहाने सभी रुस्वा ही हो गये
ईज्जत भरी कोइ मोतसे मरने दे मेरे दोस्त.

_मोहंमदअलीवफा
   
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निकल गये_मोहंमदअलीवफा
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निकल गये_मोहंमदअलीवफा - 23rd May 2007, 10:04 AM

निकल गये_मोहंमदअलीवफा

चेहरा छूपाके हमतो शहर से निकल गये
खूने कतील कब तलक खामोश ही रहता.

लावा की तरह फैला शहरकी नब्ज नब्ज में
मरजाता है ईंनसान मगर ये नही मरता.


___मोहंमदअलीवफा
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26th May 2007, 08:52 AM

wafa ji,
wahhhhh wahhhhhh kya baat hai.
bada kamaaal ka likhte ho aap.
hum hamesha padhthe hai aur hume bada acchha lagta hai.

daad qubul kijiyega.

Ziyaad.
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खून बहाये बनझारा_कालु कव्वाल
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खून बहाये बनझारा_कालु कव्वाल - 26th May 2007, 09:01 AM

कालु कव्वाल की नई निगारशात_कालु

बस्ती बस्ती परबत परबत खून बहाये बनझारा.
गर्दन नापे मज़्लूमोंकी लेके गन का एक तारा.

भगवी जमहुर डौदके आई नुसरत उसकी करने को
हक में लगाने कातिलों के झिंदाबादोका नारा.

कौन मराहै ,क्युं मराहै हमसे अदालत क्यों पूछे?
एनकाउंटर में हमने ईन बेनवाको है मारा.

हक की बात करोगे तो फिरसे जलेंगी जिंदे भी
कुछ भी हुआहै,होता रहेगा यही तो है कौमी धारा.

आपकी बिगडी किस्मतके हम मुहफिज बठें है
नहानेको भी खून से तुमको देंगे मोका दोबारा.

गांव गली और शहरोंमे रंग अपना दिखांयेगे
कालुये तो ईब्तिदा है फिर नाचेगा हत्यारा.



_______कलुकव्वाल झांपाबजार_सुरत
   
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खंजर की ये फरियाद__मोहंमदअलीवफा
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खंजर की ये फरियाद__मोहंमदअलीवफा - 27th May 2007, 09:09 AM

खंजर की ये फरियाद__मोहंमदअलीवफा


उठती है तेरे सामने खंजर की ये फरियाद
में कीसी गरीबका सीना क्यों करुं चाक.

मेरे मुअकद्दरमें ही क्युं लीखा खूनका धब्बा
मेरे ही दामन पर क्यों उडायी जाए खाक.



__मोहंमदअलीवफा
   
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न आरझु रही._मोहंमदअली वफा
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न आरझु रही._मोहंमदअली वफा - 31st May 2007, 04:21 AM

न आरझु रही._मोहंमदअली वफा

खूश्बू के बोझ की कभी न आरझु रही.
फूलोंकी सेझ की कभी न आरझु रही.

कांटे रहे अपनी जगह सह लेंगे उसे हम
खूशियोंके औस की कभी न आरझु रही

._मोहंमदअली वफा(30जुन2007)
   
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होता है__मोहंमदअलीवफा
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होता है__मोहंमदअलीवफा - 6th June 2007, 10:55 AM

होता है__मोहंमदअली’वफा’’


हवाके रूख का भी कोइ अंदाझ होता है,
बदलता वो नहीं हरदम बासाझ हो ताहै.

तारिक्यों की तरह तुम छुपते फिरते हो
जरा नपिद हुई जो रोशनी बेबाक होते हो.


__मोहंमदअली’वफा’

   
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किसान_मोहंमदअली,वफा,
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किसान_मोहंमदअली,वफा, - 8th June 2007, 10:13 AM

किसान_मोहंमदअली,वफा,

पकी हुई फस्लें ही काटा करते हैं किसान
शेतान के पीछे कभी पड्ते नहीं शेतान

कोइ उसुल जाब्ता तुम्हारा भेरिये नहीं
मांओ का पेट चीर कर जिंदे जले संतान
.

_मोहंमदअली,वफा,
   
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फरियाद नहीं._मोहंदअलीवफा
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फरियाद नहीं._मोहंदअलीवफा - 18th June 2007, 01:11 PM

फरियाद नहीं._मोहंदअली’वफा’

कोइ तनकीद शिकवह कोइ फरियाद नहीं.
कोइ भी झुलम अब तेरा याद नहीं.

हम तो सो गये बिसाते गुल समझ कर,
कांटेका बिछौना था गर एतेमाद नहीं .

तगाफुलका के ये अंदाझ निराला पाया
हसते रहे बस दूरसे कोइ एहसास नहीं.

झर्रे झर्रेको हमने तो अपनाईयत बखशी,
आस्तींका बना कौन कभी सांप याद नहीं

हमारे दिल की झमीं गुलके दस्ते ही रही
लाख गरदिशे दौरां मे भी बरबाद नहीं

___मोहंदअली’वफा’(18जुन्अ2007)
   
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उम्मीदका. __ मोहंमदअलीवफा
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उम्मीदका. __ मोहंमदअलीवफा - 30th June 2007, 07:35 AM

उम्मीदका. __ मोहंमदअलीवफा

चल कहीं तो आयेगा अपना जहां उम्मीदका.
ये खिझां की लाश में तड्पता गुलसितां उम्मीदका

चोंच में एक तिनका ,ले परींद फिरता रहा,
बनता है एक एक से तो कारवां उम्मीद का.

ए हवा के रुख मुरव्वतका जरा तु साथ दे
तेरे शरर से तूटे ना आशियां उम्मीदका.

रह्ती भरम में बात तो दिल का नहोता युं झियां
हम भी समझ लेतें तुम्हे एक पासबां उम्मीदका.

डूबो कहीं साहिल पे या जा कर कहीं मझ्धार में
कोइ बनेगा अब् कहां एक राझदां उम्मीदका.

पी सके न खुद न औरों को मुंह पे ये लगी
मयकदे से ना रहा कोइ आशना उम्मीदका.

अबवफा लफ्जोंमे भी वो बाकपन क्या ढुंढ्ते
मकते में आया नही कोइ महेरबां उम्मीदका.


____ मोहंमदअलीवफा
   
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दास्तां._मोहंमद अलीवफा
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दास्तां._मोहंमद अलीवफा - 10th July 2007, 04:11 AM

दास्तां._मोहंमद अलीवफा

कया कहुं में यार की हिकमत की दास्तां.
अल्फाज में बन जायेगी झ्हमत की दास्तां.

बनझर जमींमें छा गई कांटोकी कई बहार्
किसने उठाली हाय ए किस्मत की दास्तां.

किस्से पुराने हो गये गर याद है ताजा
छेर न ए बिजली तु अब वहशत की दास्तां.

भूल जाना भी अजीब एक खेल बन गया
लोग कहतें है एसे फितरत की दास्तां.

माजी की दीवार से ये कौन आ टपका
बहते हुए खुं मे लीये हसरत की दास्तां.

अब वफा कैसे कुरेदें कोई भी लम्हा
हर लम्हे मे मदफन हे ईज्जत की दास्तां


_मोहंमद अलीवफा(9जुलाई007)
   
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मौखाने से शराब._मोहंमदअलीवफा
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मौखाने से शराब._मोहंमदअलीवफा - 14th July 2007, 08:55 AM

मौखाने से शराब._मोहंमदअलीवफा


कौन ला कर दे हमें उउसका भी कुछ जवाब.
साकी उठाके ले गया मौखाने से शराब.

उनकी नजर ने और भी रुस्वा किया हमें,
वरना फुरसद किसे रही कि देखते शबाब.

खो गये थे हम कभी गुबारे खवाब में
वल्लाह पूछिये नही उन रातोंका हिसाब.

शरमाके चांद चांदनी बिस्तर लपट गये,
उठ गया अलल सबह जब थोडासा निकाब.

खूश्बु कहां से भर गई अब सांसो मे फूलकी,
बरसो हुए हमने तो देखा नहीं गुलाब.

जुलमत कदे में हम जो गये सहरा भी ले गये,
और चांदनी ने रात भर उतारा नहीं हिजाब.


_मोहंमदअलीवफा
   
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चाहिये._मोहंमदअलीवफा
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चाहिये._मोहंमदअलीवफा - 22nd July 2007, 10:08 AM

चाहिये._मोहंमदअली’वफा’


कहनेको भी कोइ हमारा तो चाहिये.
तिनका सही कोइ सहारा तो चाहिये.

हसरत भरी आंखोसे जीसे देखते रहें’
लूंटे हुए गुलशनका नजारा तो चाहिये.

मझधारमें जानेकी हिम्मत कहां रही,
डूबे मगर कोइ किनारा तो चाहिये.

अच्छा हुआ आपने तोडे अहद पैमां,
शिकवा का कभी कोइ नारा तो चाहिये.

रंजिश हुइ ‘वफा’ मगर बात खुल गई.
किस्मतके हाथका कोइ मारा तो चाहिये.

(22जुलाई2007)

Last edited by wafa ali; 22nd July 2007 at 10:15 AM..
   
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नजर आएंगे._ मोहंमदअली वफा
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नजर आएंगे._ मोहंमदअली वफा - 5th August 2007, 10:54 AM

नजर आएंगे._ मोहंमदअली वफा

बदले बदले सरकार नजर आएंगे.
वकत पर आसार नजर आएंगे.

होगा हर शयका सौदा चौराहों पर,
हर घर गली बाजार नजर आएंगे.

सच का दामन जो थामे तूटे आस्मां,
मोती ईख्लासके बेकार नजर आएंगे.

रेंगेगे सांप कज्जाबोके दोलत पर
दयानते गुल नादार नजर आएंगे.

अब बस्ती में अदलिया का दिया बुझा,
तिफ्लाने चोर शाहुकार नजर आएंगे.

   
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जवान है,_ मोहम्मदअलीवफा
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जवान है,_ मोहम्मदअलीवफा - 7th August 2007, 08:00 AM

जवान है,_ मोहम्मदअलीवफा


बोसीदा शहर हो गया रस्ते जवान है,
है पुरानी सब तक्तीयों और नये नाम है.

रोता रहा बागबां उझडी बहार पर,
पत्त्ते पत्ते पर पर कुनंदा एक बयान है.

ऊनकी नजरका फासला दूरी न ला सका,
बर्सों हुए ईस जख्मको फीर भी जवान है.

अब कैसे बुझाए उसे कुछ मशवरा तो दो.
पानी में लगी आग और उसमें मकान है.

होना था वो हो गाया हम देखते ही रहे,
दीनो ईमां ईज्जत लूटी और बंध जबान है.

तरपता रहा मज्लूम देहलीझपर उनकी
जान दे दी कुचे मेंजहां दिलकी दुकान है.


6thAug.2007
   
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बात खतम!___मोहंमदअलीवफा
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बात खतम!___मोहंमदअलीवफा - 10th August 2007, 10:25 AM

बात खतम!


तुने अपना रंग दिखाया; बात खतम!
मैंने अपना रंग जमाया; बात खतम!

जलता है अब थंडी थंडी रातोंमे भी,
तु तो बना है अब हरजाया; बात खतम!

अजमत अपनी कोइभी बाकी रख नसका
तुझको देख हेवां शरमाया ; बात खतम!

तेरा खंजर खूनका प्यासा घूम रहा है,
हमने अपना दिल बहलाया ; बात खतम!

पस्तीके कागज को लेके घूम रहा है,
तुने सबको खूब भरमाया ; बात खतम!

लोग खडे हैं अपनी अपनी पर छाईमें,
ढुंढ्ले तु भी अपना साया; बात खतम!


__मोहंमदअलीवफा8अओग!2007
   
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25th August 2007, 10:42 AM

गुल मिसालके _ मोहंमदअलीवफा

खूलतेहैं वर्क़ कैसे कैसे कमालके.
चहेरा छूपाके बैठे थे हैं जो जमालके.

सादगीसे खारोंको हमने चुम लिया,
गुजरे हैं कुछ एसे लम्हे विसालके.

असली थे वो खिंझाओमें खो गए,
कागजी थे रह गये गुल मिसालके.

होता अगर मुमकिन कर लेते उसेभी,
दे देते हाथ में तेरे दिलको निकालके.

अपने नकूश से युं खाते फरेब क्युं,
रखते कदम होशके थोडे संभालके.

हमको खुदा तु हिदायत नवाझ दे,
हमने सुने है किस्से तेरे जलालके.

(27 ओग.2007)
   
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गुल मिसालके _ मोहंमदअलीवफा
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गुल मिसालके _ मोहंमदअलीवफा - 25th August 2007, 11:56 AM

गुल मिसालके _ मोहंमदअलीवफा

खूलतेहैं वर्क़ कैसे कैसे कमालके.
चहेरा छूपाके बैठे थे हैं जो जमालके.

सादगीसे खारोंको हमने चुम लिया,
गुजरे हैं कुछ एसे लम्हे विसालके.

असली थे वो खिंझाओमें खो गए,
कागजी थे रह गये गुल मिसालके.

होता अगर मुमकिन कर लेते उसेभी,
दे देते हाथ में तेरे दिलको निकालके.

अपने नकूश से युं खाते फरेब क्युं,
रखते कदम होशके थोडे संभालके.

हमको खुदा तु हिदायत नवाझ दे,
हमने सुने है किस्से तेरे जलालके.

(27 ओग.2007)
   
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शीशों में उतरना है _ मोहंमदअलीवफा
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शीशों में उतरना है _ मोहंमदअलीवफा - 5th September 2007, 10:02 AM

शीशों में उतरना है _ मोहंमदअलीवफा



शरारे संग के लेकर ए शीशों में उतरना है.
अभीतो आहनी लबकी सुराहीमें पीघलनाहै.

चमकती बर्फकी राहें कहीं धोका नदे तुझको,
दिवारें है बहुत चिकनी ,चढनाहै संभलना है.

(5सप्टे.2007)
   
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New updates - 5th September 2007, 10:23 AM

વધુ માટે નીચેના બ્લોગ પર કલીક કરવા વિનંતી:
બઝમે વફા बझ्मे वफा Bazme wafa بزمِ وَفاَ
http://bazmewafa.wordpress.com/
બાગેવફા बागेवफा BAGEWAFA بَاغِ وَفا
http://arzewafa.wordpress.com/
   
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नजमें _ मोहंमदअली .वफा,
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नजमें _ मोहंमदअली .वफा, - 6th September 2007, 02:34 PM

नजमें _ मोहंमदअली .वफा,


अब नींद के गाढे जंगलमे
आंखोकी पलकों को
मीलनाथा पर ये तो खुली ही रह गई
अब खुली आंखोसे तेरे
सोये हुए ख्वाब देखती है

***************
तल्खीयों के नाखुन
कीतने लंबे हो गये
सूरजकी गरदन खुरेदकर
दिन भर लहु निकाला
लोग उसे रोशनी समझे धोका खा गये
जबये खून सुखकर काला हुआ
तारिक्यों के सांप जमींको निगल गये.
(6सप्टे.2007)
   
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सितम देखतें हैं__मोहंमदअलीवफा
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सितम देखतें हैं__मोहंमदअलीवफा - 11th September 2007, 09:59 AM

सितम देखतें हैं_मोहंमदअली’वफा

करम कि जगह पर सितम देखतें हैं
अरे दोस्त ये कया जुलम देखतें हैं.

कभी चश्मे वीरांको नम होने देते
परीशांए झूल्फोंमे गम देखते हैं

तगाफुल तुमहारा हिमालय बनाहै
तुझे कीस तमन्नासे हम देखते हैं.

कोइ जब्र है कि फितरत तुम्हारी
हमारी तरफ तुम कम देखते हैं.

बदलना नही अब कोइ बेश पडता
खुली आंखसे हम भरम देखते हैं.

‘वफा’ हम तो गर्वीदा दीदार के थे
है लानत जो तेरे कदम देख्ते हैं..




Dekhte haiN._Mohammedali’wafa’


Karam ki jagah par sitam dekhte haiN
Are dost ye kya julam dekhte haiN.

Kabhee chashme veeraaN ko num hone dete
parishaaNae zoolfome gum dekhte haiN.

Tagaful tumhara himalay bana hai
Tuze kis tamannase ham dekhte haiN

Koi jabra hai ya ye feetrat tumhari
Hamaaree taraf tum kum dekhate haiN.

Badalana naheeN ab koi besh padtaa
Khuli aankhse hum bharam dekhte haiN.

‘vafa’ hum to garveeda deedar ke the
Hai lanat jot tere qadam dekhte haiN.

._Mohammedali’wafa (25th may2007)



Note: http://www.mushaira.org/competition.php May-June2007 Tarahi Mushayera winner gazal.
Tarahi misra:
tujhe kis tamannaa se ham dekhte haiN

Last edited by wafa ali; 11th September 2007 at 10:03 AM.. Reason: spell error
   
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एक शेर _वफा
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एक शेर _वफा - 18th September 2007, 03:54 PM

एक शेर _वफा

आज तक तुने रकीब मेरा शहर लूटा नहीं,
कया क़तलकी अब कोइ साजिश रचाई है.

वफा

Last edited by wafa ali; 18th September 2007 at 03:56 PM.. Reason: spell
   
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पेहचान गये वो * मोहंमदअलीवफा
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पेहचान गये वो * मोहंमदअलीवफा - 21st September 2007, 11:37 AM

पेहचान गये वो * मोहंमदअलीवफा


जो जानते नहींथे पेहचान गये वो.
हर रोज मिलने वाले अजनबी बने.

किस्सा मुख्तसर, तफसील बे मजा,
नारे हसदमें जो जले पिन्हां जली बने.
   
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तो याद रहे._ मोहम्मदअलीवफा
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तो याद रहे._ मोहम्मदअलीवफा - 5th October 2007, 10:22 AM

तो याद रहे. मोहम्मदअलीवफा

कोइ किस्सा कोइ करम तो याद रहे.
भूलसे भी हो कोइ भरम तो याद रहे.

परबतों पे जम गया यादों का बरफ,
पिगली हुइ आंखोकी शरम तो याद रहे.

आवारा जंगलोमें खो गई सबही मता
थोडा सही ईमानो धरम तो याद रहे.

माना कि वो दर्द दिल में उठताही नहीं,
बेदर्दीसे कियाथा वो जखम तो याद रहे.

भूल गये तूटे हुए शीशों की तरह हमें
हम पर हुए थे वो सितम तो याद रहे.

कुछ ज्यादा कुरेद हमको भी गवांरा नही,
छोडो वो अहदो वफा हम तो याद रहे.

(5ओकटो.2007)
   
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खूनसे ईफतार _ कालु
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खूनसे ईफतार _ कालु - 12th October 2007, 06:11 AM

खूनसे ईफतार _ कालु

बमकी रोटीको टीफीन में बंद करदो
दरगाहके ईफतारमें काम आयेगी
खवाजा गरीबुन्ननवाज की दूआ मिलेगी
करीबके दरख्त पर टिफीन लटकादो
ब वकत ईफतारी
टाईमींग करदो रोजादार का
मौतसे
लहुके घुंटोसे
शहादत का जाम पिये
ईफ्तार होगा ईंशाअल्लाह
हजुरके दरबारमें
जन्नत में ईफतारी होगी. तुम्हरा कया बनेगा
दुशमनाने ईंसान? गौ तो बच सकती
है ईनसां नहीं .



اِفطارخُن سے


بَم کی روٹی کو
ٹِیفِین میں بند کردو
دَرگاہ کے اِفطار میں کام آےِگی
خواجہ َغِریبُنَّواز کی دُعاعِیں مِلِگی
قَریب کےدََرَخت پر ٹیفین لَٹکا دو
بَ وقت اِفطاری تائمینگ دےدو
رَوزہدار
مَوت سے
لَہوُکے گونٹ سے
ِا فطاری کرینگے
شہادت کا جام پیےِ اِفطار ہوگا
اِنشآاَللَّلہ
ہَضوُرکے دربارمیں
َجنَّت میں اِفطار ہوگا
تمہارا کیا بنیگا
دُشمنانِ اِنسان
گََوَ تو پچ سکتی ہے
،اِنسان نَہیِں


KHOON SE IFTAR

Bumki rotiko
Tiffinmein band kardo
Dargahke Iftarmein kaam aayegi
Khwajah Garibunnawaz ki dooaaein meelegi
Qarib ke darakht par tiffin ko latkado
Ba waqte iftar timing de do
Rozahdar
Mautse
Lahookhe goont se
Shadatke jamse iftar hoga
Insha Allaha Hajoorke darbarme
Jannatmein Iftar hoga
Tumhara kya banega?
Dooshmanane Insaan
Gau To bach sakti hai
Insan naheeN


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खूनसे ईफतार _ कालु
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खूनसे ईफतार _ कालु - 12th October 2007, 07:31 AM

खूनसे ईफतार _ कालु

बमकी रोटीको टीफीन में बंद करदो
दरगाहके ईफतारमें काम आयेगी
खवाजा गरीबुन्ननवाज की दूआ मिलेगी
करीबके दरख्त पर टिफीन लटकादो
ब वकत ईफतारी
टाईमींग करदो रोजादार का
मौतसे
लहुके घुंटोसे
शहादत का जाम पिये
ईफ्तार होगा ईंशाअल्लाह
हजुरके दरबारमें
जन्नत में ईफतारी होगी. तुम्हरा कया बनेगा
दुशमनाने ईंसान? गौ तो बच सकती
है ईनसां नहीं .



اِفطارخُن سے


بَم کی روٹی کو
ٹِیفِین میں بند کردو
دَرگاہ کے اِفطار میں کام آےِگی
خواجہ َغِریبُنَّواز کی دُعاعِیں مِلِگی
قَریب کےدََرَخت پر ٹیفین لَٹکا دو
بَ وقت اِفطاری تائمینگ دےدو
رَوزہدار
مَوت سے
لَہوُکے گونٹ سے
ِا فطاری کرینگے
شہادت کا جام پیےِ اِفطار ہوگا
اِنشآاَللَّلہ
ہَضوُرکے دربارمیں
َجنَّت میں اِفطار ہوگا
تمہارا کیا بنیگا
دُشمنانِ اِنسان
گََوَ تو پچ سکتی ہے
،اِنسان نَہیِں


KHOON SE IFTAR

Bumki rotiko
Tiffinmein band kardo
Dargahke Iftarmein kaam aayegi
Khwajah Garibunnawaz ki dooaaein meelegi
Qarib ke darakht par tiffin ko latkado
Ba waqte iftar timing de do
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Lahookhe goont se
Shadatke jamse iftar hoga
Insha Allaha Hajoorke darbarme
Jannatmein Iftar hoga
Tumhara kya banega?
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14th October 2007, 07:43 PM

wafa ali Ji,

Likha tou khoob hai aapne per adhoora adhoora sa kyon chhod diyaa. pyaas bhi nahi.n bhuj paayee. humna bhi apni do ghazle.n ghazal section mei.n likhii hai.n. pad kar bataaiyegaa kaisee lagi.n.

Nahta Praveen
   
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ये रात की_वफा
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ये रात की_वफा - 16th October 2007, 02:30 PM

ये रात की_वफा

ढस गई दिवार भी ये रात की.
किस्मतें लूट गई सब ख्वाबकी.

आंख मी रूठी रही कुछ नींदसे
उलट गई सब करवटें बेताब की.

(16ओकटो.2007)
   
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नंगे निकले. वफा
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नंगे निकले. वफा - 21st October 2007, 01:29 PM

नंगे निकले. वफा

अब तलाशी कैसे और कीसकी लेग़ें वफा
ये माशुक तो दिलके सब नंगे निकले.
   
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फता दामन वहां पाया _ वफा
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फता दामन वहां पाया _ वफा - 25th October 2007, 01:55 PM

फता दामन वहां पाया _ वफा


पकडलुं कोइभी दामन तमन्ना दिलमे उठती थी,
मिले जीतने पीरे मुगां फता दामन वहां पाया
   
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जमाना ये_वफा.
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जमाना ये_वफा. - 26th October 2007, 12:07 PM

जमाना ये_वफा.

दरद की दास्तां छेडी मचल उठा जमाना ये.
हलकसे हक जो निकला मुकर ऊथा जमाना ये.

हमने तो कही अपनी गर समजे वो अपनी है,
कोइ एक जखम तडपा ,तडप ऊथा जमाना ये.
   
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