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swaraa 21st August 2013 08:26 PM

मुक्ति
 
Hello Friends ,

Kuch aur hai jo mann se kagajon pe utar aaya hai . Baant rahi hoon aapke saath. Kaisa laga batayen jaroor . Thank you.

अतीत - वर्तमान - भविष्य ...........
नहीं जानती
इन्हें बाँटना ,
इन्हें बांधना
सीमा में .
खो दिए हैं
सब सीमाओं ने
अपने आकार
और
समय बहने लगा है
अनंत प्रवाह सा .......
अब कुछ और नहीं ,
मात्र
यही पल है .......
यही सत्य है .
मन की आग में
पिघल गए हैं
समस्त
हिम - खंड
और
पावन गंगा
बह चली है .......
टूट गए हैं
अंतिम बंध
और
थमा - सा
जो भी था ,
सब बह गया है .
समय की
अबाध गति में ,
धुंधला गयी हैं
आड़ी - तिरछी ,
टूटी - बिखरी
सब रेखाएँ
हथेलियों की ......
मिट गए हैं
समूचे
कर्म - अकर्म
और
कुछ नहीं बाकी .
अब कुछ नहीं बाकी
कोई सीमा
कोई आकार
कोई विकार .
माया - अमाया
राग - द्वेष
बंध - प्रतिबन्ध .
शेष है
केवल
अनंत विस्तार ,
अमिट शून्य......
मैं
रिक्त हूँ
और
मुक्त भी .
तुम्हें
स्वीकार हूँ ना ?


sameer'shaad' 22nd August 2013 05:01 PM

bahot khoobsurat ehsaason se aapne sajaya hai is kavita ko swara ji......

aapki kalam me koi jaadu hai zaroor jo dil pe chal jaata hai aapka kalaam padh kar.....

likhti raheN.. aur apne khoobsurat ehsaason se milaati rahen hame.....

Shukriyaa

Shaad.....

swaraa 24th August 2013 08:29 PM

Shaad Ji ,

Bahut bahut shukriya kavita ko padhne aur mera hausala badhane ke liye . Aap log padhte aur sarahte hain to prerna bani rahti hai behtar likhne ki.:):)

prem_anjana 2nd September 2013 04:40 PM

sunder bhavo aur vicharon se lipt............ saarthkta ka prayaas
...swara ji ek sunder kavita.. k liye dhanyavaad
......aapka mitra prem

swaraa 9th September 2013 01:16 AM

Prem ji ,
Bahut bahut dhanyvad . aapko kavita pasand aayi .......achcha laga . aate rahen.:)

rajinderseep 30th October 2013 11:28 PM

originaaly posted by Swaara.
Swaara ji aapko meri tarf se congratulations, na sirf is kavita k liay balki aap ki is uch manostithii { enlightened ] k liay bhi.

अतीत - वर्तमान - भविष्य ...........
नहीं जानती
इन्हें बाँटना ,
इन्हें बांधना
सीमा में .
खो दिए हैं
सब सीमाओं ने
अपने आकार
और
समय बहने लगा है
अनंत प्रवाह सा .......
अब कुछ और नहीं ,
मात्र
यही पल है .......
यही सत्य है .
मन की आग में
पिघल गए हैं
समस्त
हिम - खंड
और
पावन गंगा
बह चली है .......
टूट गए हैं
अंतिम बंध
और
थमा - सा
जो भी था ,
सब बह गया है .
समय की
अबाध गति में ,
धुंधला गयी हैं
आड़ी - तिरछी ,
टूटी - बिखरी
सब रेखाएँ
हथेलियों की ......
मिट गए हैं
समूचे
कर्म - अकर्म
और
कुछ नहीं बाकी .
अब कुछ नहीं बाकी
कोई सीमा
कोई आकार
कोई विकार .
माया - अमाया
राग - द्वेष
बंध - प्रतिबन्ध .
शेष है
केवल
अनंत विस्तार ,
अमिट शून्य......
मैं
रिक्त हूँ
और
मुक्त भी .
>>>>>>>>>>>>>>>>>> meray hisab se yeh kavita yahiN khatam ho jaani chahiay thi.........
तुम्हें
स्वीकार हूँ ना ?

rajinderseep

swaraa 7th November 2013 07:00 PM

Rajinderseep Ji,

Bahut bahut dhanywad aapke sarahna bhare shabdo ke liye. Jo aapne kaha kavita ke samapt hone ke liye vo ek tarah se theek hai lekin ye sirf glimpses hain uss manostithi ke . Vo permanent hoti to ye kavita hi nahi hoti. Shayad abhi ek kadam baaki hai.


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